'क्यों दादा, उनके पास कोई खत भी नहीं पहुंच सकता? पहरे वालों को दस-पांच रूपये देने से तो शायद ख़त पहुंच जाय।'
देवीदीन ने गर्दन हिलाकर कहा,'मुसकिल है। पहरे पर बडे जंचे हुए आदमी रखे गए हैं। मैं दो बार गया था। सबों ने फाटक के सामने खडाभी न होने दिया।'
'उस बंगले के आसपास क्या है?'
'एक ओर तो दूसरा बंगला है। एक ओर एक कलमी आम का बाग़ है और सामने सड़क है।'
'हां, शाम को घूमने-घामने तो निकलते ही होंगे?'
'हां, बाहर द्दरसी
'क्यों दादा, उनके पास कोई खत भी नहीं पहुंच सकता? पहरे वालों को दस-पांच रूपये देने से तो शायद ख़त पहुंच जाय।'
देवीदीन ने गर्दन हिलाकर कहा,'मुसकिल है। पहरे पर बडे जंचे हुए आदमी रखे गए हैं। मैं दो बार गया था। सबों ने फाटक के सामने खडाभी न होने दिया।'
'उस बंगले के आसपास क्या है?'
'एक ओर तो दूसरा बंगला है। एक ओर एक कलमी आम का बाग़ है और सामने सड़क है।'
'हां, शाम को घूमने-घामने तो निकलते ही होंगे?'
'हां, बाहर द्दरसी