हमारा जीवन शुष्क और नीरस हो जायेगा। वह रंगभूमि का दीपक, आनन्द, सम्मान, परतिभा और पराण थी। जिन्होंने उसके परेम का आनन्द नहीं उठाया था, वह उसके दर्शन मात्र ही से कृतार्थ हो जाते थे। अन्य स्त्रियों से परेम करते हुए भी वह हमारे नेत्रों के सामने उपस्थित रहती थी। हम विलासियों की तो जीवनधारा थी। केवल यह विचार कि वह इस नगर में उपस्थित है, हमारी वासनाओं को उद्दीप्त किया करता था। जैसे जल की देवी वृष्टि करती है, अग्नि की देवी जलाती है,
हमारा जीवन शुष्क और नीरस हो जायेगा। वह रंगभूमि का दीपक, आनन्द, सम्मान, परतिभा और पराण थी। जिन्होंने उसके परेम का आनन्द नहीं उठाया था, वह उसके दर्शन मात्र ही से कृतार्थ हो जाते थे। अन्य स्त्रियों से परेम करते हुए भी वह हमारे नेत्रों के सामने उपस्थित रहती थी। हम विलासियों की तो जीवनधारा थी। केवल यह विचार कि वह इस नगर में उपस्थित है, हमारी वासनाओं को उद्दीप्त किया करता था। जैसे जल की देवी वृष्टि करती है, अग्नि की देवी जलाती है,