अलंकार - Alankar

और परसन्नमुख बैठी हुई थी उसने भूमि पर सिर झुकाकर तीन बार ईश्वर की वन्दना की।

'ओ हो ! उस स्त्री के चरण कितने सुन्दर हैं जो सन्मार्ग पर चलती है ! हां, उसके चरण कितने सुन्दर, कितने कामल और कितने गौरवशील हैं, उसका मुख कितना कान्तिमय!'

यह कहकर वह उठा, कनटोप अपनी आंखों पर खींच लिया और मन्दगति से अपने आश्रम की ओर चला।

अलबीना ने अपनी एककुमारी को बुलाकर कहा-'पिरय पुत्री, तुम थायस के पास आवश्यक वस्तु पहुंचा दो, रोटियां, पानी और एक तीन छिद्रों वाली बांसुरी।


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और परसन्नमुख बैठी हुई थी उसने भूमि पर सिर झुकाकर तीन बार ईश्वर की वन्दना की।

'ओ हो ! उस स्त्री के चरण कितने सुन्दर हैं जो सन्मार्ग पर चलती है ! हां, उसके चरण कितने सुन्दर, कितने कामल और कितने गौरवशील हैं, उसका मुख कितना कान्तिमय!'

यह कहकर वह उठा, कनटोप अपनी आंखों पर खींच लिया और मन्दगति से अपने आश्रम की ओर चला।

अलबीना ने अपनी एककुमारी को बुलाकर कहा-'पिरय पुत्री, तुम थायस के पास आवश्यक वस्तु पहुंचा दो, रोटियां, पानी और एक तीन छिद्रों वाली बांसुरी।


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