डोल रखे देता हूं और तुम्हारी बातें सुनने को तैयार हूं।'
पापनाशी ने वृद्ध साधु से अपनी इस्कन्द्रिया की यात्रा, थायस के उद्घार, वहां से लौटने-दिनों की दूषित कल्पनाओं और रातों के दुःस्वप्नों-का सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उस रात के पापस्वप्न और गीदड़ों के झुंड की बात भी न छिपाई और तब उससे पूछा-'पूज्य पिता, क्या ऐसीऐसी असाधारण योगित्र्कयाएं करनी चाहिए कि परेतराज भी चकित हो जायें ?'
पालम सन्त ने उत्तर दिया-'भाई पापनाशी,
डोल रखे देता हूं और तुम्हारी बातें सुनने को तैयार हूं।'
पापनाशी ने वृद्ध साधु से अपनी इस्कन्द्रिया की यात्रा, थायस के उद्घार, वहां से लौटने-दिनों की दूषित कल्पनाओं और रातों के दुःस्वप्नों-का सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उस रात के पापस्वप्न और गीदड़ों के झुंड की बात भी न छिपाई और तब उससे पूछा-'पूज्य पिता, क्या ऐसीऐसी असाधारण योगित्र्कयाएं करनी चाहिए कि परेतराज भी चकित हो जायें ?'
पालम सन्त ने उत्तर दिया-'भाई पापनाशी,