अलंकार - Alankar

उसने एक विचित्र दृश्य देखा। ऐसा जान पड़ता था कि अगणित बालुकरण किसी परचण्ड आंधी से उड़कर कुटी में फैल गये हैं। जब उसने जरा ध्यान से देखा तो परत्येक बालुकरण यथार्थ में एक अति सूक्ष्म आकार का गीदड़ था, सारी कुटी शृंगालमय हो गयी थी।

उसी रात को पापनाशी ने स्वप्न देखा कि एक बहुत ऊंचा पत्थर का स्तम्भ है, जिसके शिखर पर एक आदमी का चेहरा दिखाई दे रहा है। उसके कान में कहीं से यह आवाज आयी-इस स्तम्भ पर च़ !

पापनाशी जागा तो उसे


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उसने एक विचित्र दृश्य देखा। ऐसा जान पड़ता था कि अगणित बालुकरण किसी परचण्ड आंधी से उड़कर कुटी में फैल गये हैं। जब उसने जरा ध्यान से देखा तो परत्येक बालुकरण यथार्थ में एक अति सूक्ष्म आकार का गीदड़ था, सारी कुटी शृंगालमय हो गयी थी।

उसी रात को पापनाशी ने स्वप्न देखा कि एक बहुत ऊंचा पत्थर का स्तम्भ है, जिसके शिखर पर एक आदमी का चेहरा दिखाई दे रहा है। उसके कान में कहीं से यह आवाज आयी-इस स्तम्भ पर च़ !

पापनाशी जागा तो उसे


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