रंगभूमि - Rangbhumi

झुकाए यह वाग्बाण सह रहा था। मुँह से एक शब्द भी न निकालता था।

भैरों ताड़ी उतारने जा रहा था, रुक गया, और सूरदास पर दो-चार छींटे उड़ा दिए-जमाना ही ऐसा है, सब रोजगारों से अच्छा भीख माँगना। अभी चार दिन पहले घर में भूँजी भाँग न थी, अब चार पैसे के आदमी हो गए हैं। पैसे होते हैं, तभी घमंड होता है; नहीं क्या घमंड करेंगे हम और तुम, जिनकी एक रुपया कमाई है, तो दो खर्च है!

जगधार औरों से तो भीगी बिल्ली बना रहता था, सूरदास को धिाक्कारने


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झुकाए यह वाग्बाण सह रहा था। मुँह से एक शब्द भी न निकालता था।

भैरों ताड़ी उतारने जा रहा था, रुक गया, और सूरदास पर दो-चार छींटे उड़ा दिए-जमाना ही ऐसा है, सब रोजगारों से अच्छा भीख माँगना। अभी चार दिन पहले घर में भूँजी भाँग न थी, अब चार पैसे के आदमी हो गए हैं। पैसे होते हैं, तभी घमंड होता है; नहीं क्या घमंड करेंगे हम और तुम, जिनकी एक रुपया कमाई है, तो दो खर्च है!

जगधार औरों से तो भीगी बिल्ली बना रहता था, सूरदास को धिाक्कारने


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