के लिए वह भी निकल पड़ा। सूरदास पछता रहा था कि मैंने लाठी क्यों न छोड़ दी, कौन कहे कि दूसरी लकड़ी न मिलती। जगधार और भैरों के कटु वाक्य को सुन-सुनकर वह और भी दु:खी हो रहा था। अपनी दीनता पर रोना आता था। सहसा मिठुआ भी आ पहुँचा। वह भी शरारत का पुतला था, घीसू से भी दो अंगुल बढ़ा हुआ। जगधार को देखते ही यह सरस पद गा-गाकर चिढ़ाने लगा-
लालू का लाल मुँह, जगधार का काला,
जगधार तो हो गया लालू का साला।
भैरों को भी उसने एक स्वरचित पद सुनाया :
के लिए वह भी निकल पड़ा। सूरदास पछता रहा था कि मैंने लाठी क्यों न छोड़ दी, कौन कहे कि दूसरी लकड़ी न मिलती। जगधार और भैरों के कटु वाक्य को सुन-सुनकर वह और भी दु:खी हो रहा था। अपनी दीनता पर रोना आता था। सहसा मिठुआ भी आ पहुँचा। वह भी शरारत का पुतला था, घीसू से भी दो अंगुल बढ़ा हुआ। जगधार को देखते ही यह सरस पद गा-गाकर चिढ़ाने लगा-
लालू का लाल मुँह, जगधार का काला,
जगधार तो हो गया लालू का साला।
भैरों को भी उसने एक स्वरचित पद सुनाया :