सूरदास-जरा इन्हीं मियाँ साहब से कुछ बातचीत करनी है।
दयागिरि-क्या इसी जमीन के बारे में?
सूरदास-हाँ, मेरा विचार है कि यह जमीन बेचकर कहीं तीर्थयात्रा करने चला जाऊँ। इस मुहल्ले में अब निबाह नहीं है।
दयागिरि-सुना, आज भैरों तुम्हें मारने की धमकी दे रहा था।
सूरदास-मैं तरह न दे जाता, तो उसने मार ही दिया था। सारा मुहल्ला बैठा हँसता रहा, किसी की जबान न खुली कि अंधे-अपाहिज आदमी पर यह कुन्याव क्यों करते हो। तो जब मेरा कोई हितू नहीं है,
सूरदास-जरा इन्हीं मियाँ साहब से कुछ बातचीत करनी है।
दयागिरि-क्या इसी जमीन के बारे में?
सूरदास-हाँ, मेरा विचार है कि यह जमीन बेचकर कहीं तीर्थयात्रा करने चला जाऊँ। इस मुहल्ले में अब निबाह नहीं है।
दयागिरि-सुना, आज भैरों तुम्हें मारने की धमकी दे रहा था।
सूरदास-मैं तरह न दे जाता, तो उसने मार ही दिया था। सारा मुहल्ला बैठा हँसता रहा, किसी की जबान न खुली कि अंधे-अपाहिज आदमी पर यह कुन्याव क्यों करते हो। तो जब मेरा कोई हितू नहीं है,