तो मैं क्यों दूसरों के लिए मरूँ?
दयागिरि-नहीं सूरे, मैं तुम्हें जमीन बेचने की सलाह न दूँगा। धर्म का फल इस जीवन में नहीं मिलता। हमें ऑंखें बंद करके नारायन पर भरोसा रखते हुए धर्म-मार्ग पर चलते रहना चाहिए। सच पूछो, तो आज भगवान् ने तुम्हारे धर्म की परीक्षा ली है। संकट ही में धीरज और धर्म की परीक्षा होती है। देखो, गुसाईंजी ने कहा है :
'आपत्ति-काल परखिये चारी। धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी।'
जमीन पड़ी है, पड़ी रहने दो। गउएँ चरती हैं,
तो मैं क्यों दूसरों के लिए मरूँ?
दयागिरि-नहीं सूरे, मैं तुम्हें जमीन बेचने की सलाह न दूँगा। धर्म का फल इस जीवन में नहीं मिलता। हमें ऑंखें बंद करके नारायन पर भरोसा रखते हुए धर्म-मार्ग पर चलते रहना चाहिए। सच पूछो, तो आज भगवान् ने तुम्हारे धर्म की परीक्षा ली है। संकट ही में धीरज और धर्म की परीक्षा होती है। देखो, गुसाईंजी ने कहा है :
'आपत्ति-काल परखिये चारी। धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी।'
जमीन पड़ी है, पड़ी रहने दो। गउएँ चरती हैं,