दूधिाया पिलाऊँगा और मिठुआ को भर-पेट मिठाइयाँ खिलाऊँगा। जब न मानेगा, तो देखी जाएगी।
बजरंगी-जरा मियाँ साहब के पास क्यों नहीं चले चलते? सूरदास ने उससे न जाने क्या-क्या बातें की हों। कहीं लिखा-पढ़ी कराने को कह आया हो, तो फिर चाहे कितनी ही आरजू-बिनती करोगे, कभी अपनी बात न पलटेगा।
नायकराम-मैं उस मुंशी के द्वार पर न जाऊँगा। उसका मिजाज और भी आसमान पर चढ़ जाएगा।
बजरंगी-नहीं पंडाजी, मेरी खातिर से जरा चले चलो।
नायकराम आखिर
दूधिाया पिलाऊँगा और मिठुआ को भर-पेट मिठाइयाँ खिलाऊँगा। जब न मानेगा, तो देखी जाएगी।
बजरंगी-जरा मियाँ साहब के पास क्यों नहीं चले चलते? सूरदास ने उससे न जाने क्या-क्या बातें की हों। कहीं लिखा-पढ़ी कराने को कह आया हो, तो फिर चाहे कितनी ही आरजू-बिनती करोगे, कभी अपनी बात न पलटेगा।
नायकराम-मैं उस मुंशी के द्वार पर न जाऊँगा। उसका मिजाज और भी आसमान पर चढ़ जाएगा।
बजरंगी-नहीं पंडाजी, मेरी खातिर से जरा चले चलो।
नायकराम आखिर