आते रहते हैं; पर आज तक कभी नहीं सुना कि किसी अंगरेज के बच्चे को नज़र लगी हो। उन पर बलैयात का असर ही नहीं होता।
यह पते की बात थी। ताहिर अली को भी इसका तुजुर्बा था। उनके घर के सभी बच्चे गंडों और तावीजों से मढ़े हुए थे, उस पर भी आए दिन झाड़-फूँक और राई-नोन की जरूरत पड़ा ही करती थी।
धर्म का मुख्य स्तम्भ भय है। अनिष्ट की शंका को दूर कीजिए, फिर तीर्थ-यात्रा, पूजा-पाठ, स्नान-धयान, रोज़ा-नमाज, किसी का निशान भी न रहेगा। मसजिदें खाली नज़र आएँगी, और मंदिर वीरान!
आते रहते हैं; पर आज तक कभी नहीं सुना कि किसी अंगरेज के बच्चे को नज़र लगी हो। उन पर बलैयात का असर ही नहीं होता।
यह पते की बात थी। ताहिर अली को भी इसका तुजुर्बा था। उनके घर के सभी बच्चे गंडों और तावीजों से मढ़े हुए थे, उस पर भी आए दिन झाड़-फूँक और राई-नोन की जरूरत पड़ा ही करती थी।
धर्म का मुख्य स्तम्भ भय है। अनिष्ट की शंका को दूर कीजिए, फिर तीर्थ-यात्रा, पूजा-पाठ, स्नान-धयान, रोज़ा-नमाज, किसी का निशान भी न रहेगा। मसजिदें खाली नज़र आएँगी, और मंदिर वीरान!