वह खुदा से मुँह फेरकर अपनी टेक पर दृढ़ रह सकती है, तो मैं अपने ईमान पर दृढ़ रहते हुए क्यों उसकी खुशामद करूँ।
प्रभु सेवक नित्य एक बार सोफिया से मिलने जाया करते था। कुँवर साहब और विनय, दोनों ही की विनयशीलता और शालीनता ने उसे मंत्र-मुग्धा कर दिया था। कुँवर साहब गुणज्ञ थे। उन्होंने पहले ही दिन, एक निगाह में ताड़ लिया कि वह साधारण बुध्दि का युवक नहीं है। उन पर शीघ्र ही प्रकट हो गया कि इसकी स्वाभाविक रुचि साहित्य-दर्शन की
वह खुदा से मुँह फेरकर अपनी टेक पर दृढ़ रह सकती है, तो मैं अपने ईमान पर दृढ़ रहते हुए क्यों उसकी खुशामद करूँ।
प्रभु सेवक नित्य एक बार सोफिया से मिलने जाया करते था। कुँवर साहब और विनय, दोनों ही की विनयशीलता और शालीनता ने उसे मंत्र-मुग्धा कर दिया था। कुँवर साहब गुणज्ञ थे। उन्होंने पहले ही दिन, एक निगाह में ताड़ लिया कि वह साधारण बुध्दि का युवक नहीं है। उन पर शीघ्र ही प्रकट हो गया कि इसकी स्वाभाविक रुचि साहित्य-दर्शन की