ओर है। वाणिज्य और व्यापार से इसे उतनी ही भक्ति है, जितनी विनय की जमींदारी से। इसलिए वह प्रभु सेवक से प्राय: साहित्य और काव्य आदि विषयों पर वर्तालाप किया करते थे। वह उसकी प्रवृत्तियों को राष्ट्रीयता के भावों से अलंकृत कर देना चाहते थे। प्रभु सेवक को भी ज्ञात हो गया कि यह महाशय काव्य-कला के मर्मज्ञ हैं। इनसे उसे वह स्नेह हो गया था, जो कवियों को रसिक जनों से हुआ करता है। उसने इन्हें अपनी कई काव्य-रचनाएँ सुनाई थीं, और उनकी
ओर है। वाणिज्य और व्यापार से इसे उतनी ही भक्ति है, जितनी विनय की जमींदारी से। इसलिए वह प्रभु सेवक से प्राय: साहित्य और काव्य आदि विषयों पर वर्तालाप किया करते थे। वह उसकी प्रवृत्तियों को राष्ट्रीयता के भावों से अलंकृत कर देना चाहते थे। प्रभु सेवक को भी ज्ञात हो गया कि यह महाशय काव्य-कला के मर्मज्ञ हैं। इनसे उसे वह स्नेह हो गया था, जो कवियों को रसिक जनों से हुआ करता है। उसने इन्हें अपनी कई काव्य-रचनाएँ सुनाई थीं, और उनकी