रंगभूमि - Rangbhumi



सूरदास-कहाँ महाराज, आज तो एक भागवान से भी भेंट न हुई।

नायकराम-जो भाग्य में था, मिल गया। चलो, घर चलें। बहुत ठंड लगती हो, तो मेरा यह अंगोछा कंधो पर डाल लो। मैं तो इधार आया था कि कहीं साहब मिल जाएँ, तो दो-दो बातें कर लूँ। फिर एक बार उनकी और हमारी भी हो जाए।

सूरदास चलने को उठा ही था कि सहसा एक गाड़ी की आहट मिली। रुक गया। आस बँधी। एक क्षण में फिटन आ पहुँची। सूरदास ने आगे बढ़कर कहा-दाता, भगवान् तुम्हारा कल्यान करें, अंधे की खबर लीजिए।


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सूरदास-कहाँ महाराज, आज तो एक भागवान से भी भेंट न हुई।

नायकराम-जो भाग्य में था, मिल गया। चलो, घर चलें। बहुत ठंड लगती हो, तो मेरा यह अंगोछा कंधो पर डाल लो। मैं तो इधार आया था कि कहीं साहब मिल जाएँ, तो दो-दो बातें कर लूँ। फिर एक बार उनकी और हमारी भी हो जाए।

सूरदास चलने को उठा ही था कि सहसा एक गाड़ी की आहट मिली। रुक गया। आस बँधी। एक क्षण में फिटन आ पहुँची। सूरदास ने आगे बढ़कर कहा-दाता, भगवान् तुम्हारा कल्यान करें, अंधे की खबर लीजिए।


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