रंगभूमि - Rangbhumi



फिटन रुक गई, और चतारी के राजा साहब उतर पड़े। नायकराम उनका पंडा था। साल में दो-चार सौ रुपये उनकी रियासत से पाता था। उन्हें आशीर्वाद देकर बोला-सरकार का इधार कैसे आना हुआ? आज तो बड़ी ठंड है।

राजा साहब-यही सूरदास है, जिसकी जमीन आगे पड़ती है? आओ, तुम दोनों आदमी मेरे साथ बैठ जाओ, मैं जरा उस जमीन को देखना चाहता हूँ।

नायकराम-सरकार चलें, हम दोनों पीछे-पीछे आते हैं।

राजा साहब-अजी आकर बैठ जाओ, तुम्हें आने में देर होगी, और मैंने अभी संध्‍या नहीं की है।


370 of 2783



फिटन रुक गई, और चतारी के राजा साहब उतर पड़े। नायकराम उनका पंडा था। साल में दो-चार सौ रुपये उनकी रियासत से पाता था। उन्हें आशीर्वाद देकर बोला-सरकार का इधार कैसे आना हुआ? आज तो बड़ी ठंड है।

राजा साहब-यही सूरदास है, जिसकी जमीन आगे पड़ती है? आओ, तुम दोनों आदमी मेरे साथ बैठ जाओ, मैं जरा उस जमीन को देखना चाहता हूँ।

नायकराम-सरकार चलें, हम दोनों पीछे-पीछे आते हैं।

राजा साहब-अजी आकर बैठ जाओ, तुम्हें आने में देर होगी, और मैंने अभी संध्‍या नहीं की है।


370 of 2783