रंगभूमि - Rangbhumi



सोफी-वह कुर्सी लगाएँगे और मैं बैठूँगी! कितनी भद्दी बात है!

प्रभु सेवक-मैं रोकता भी, तो वह न मानते।

सोफी-इस कमरे में इनसे कैसे रहा जाता है?

प्रभु सेवक-पूरे योगी हैं। मैं तो प्रेम-वश चला आता हूँ।

इतने में विनय ने एक गद्देदार कुर्सी लाकर सोफी के लिए रख दी। सोफी संकोच और लज्जा से गड़ी जा रही थी। विनय की ऐसी दशा हो रही थी, मानो पानी में भीग रहे हैं। सोफी मन में कहती थी-कैसा आदर्श जीवन है! विनय मन में कहते थे-कितना


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सोफी-वह कुर्सी लगाएँगे और मैं बैठूँगी! कितनी भद्दी बात है!

प्रभु सेवक-मैं रोकता भी, तो वह न मानते।

सोफी-इस कमरे में इनसे कैसे रहा जाता है?

प्रभु सेवक-पूरे योगी हैं। मैं तो प्रेम-वश चला आता हूँ।

इतने में विनय ने एक गद्देदार कुर्सी लाकर सोफी के लिए रख दी। सोफी संकोच और लज्जा से गड़ी जा रही थी। विनय की ऐसी दशा हो रही थी, मानो पानी में भीग रहे हैं। सोफी मन में कहती थी-कैसा आदर्श जीवन है! विनय मन में कहते थे-कितना


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