तो इसका मुझे क्यों अफसोस हो, वे शौक से खाएँ, आराम से रहें। तुम्हारी बातों से हसद की बू आती है। खुदा के लिए मुझसे ऐसी बातें न किया करो।
कुल्सूम-पछताओगे; जब समझाती हूँ, मुझ ही पर नाराज होते हो; लेकिन देख लेना, कोई बात न पूछेगा।
ताहिर-यह सब तुम्हारी नियत का कसूर है।
कुल्सूम-हाँ, औरत हूँ, मुझे अक्ल कहाँ! पड़े तो हो, किसी ने झाँका तक नहीं। कलक होती, तो यों चैन से न बैठी रहतीं।
ताहिर अली ने करवट ली, तो कंधो में असह्य
तो इसका मुझे क्यों अफसोस हो, वे शौक से खाएँ, आराम से रहें। तुम्हारी बातों से हसद की बू आती है। खुदा के लिए मुझसे ऐसी बातें न किया करो।
कुल्सूम-पछताओगे; जब समझाती हूँ, मुझ ही पर नाराज होते हो; लेकिन देख लेना, कोई बात न पूछेगा।
ताहिर-यह सब तुम्हारी नियत का कसूर है।
कुल्सूम-हाँ, औरत हूँ, मुझे अक्ल कहाँ! पड़े तो हो, किसी ने झाँका तक नहीं। कलक होती, तो यों चैन से न बैठी रहतीं।
ताहिर अली ने करवट ली, तो कंधो में असह्य