रंगभूमि - Rangbhumi

जॉन सेवक विदा हुए। रास्ते में ताहिर अली सोचने लगे-साहब को मेरी दुर्गति से अपना स्वार्थ सिध्द करने में जरा भी संकोच नहीं हुआ। क्या ऐसे धानी-मानी, विशिष्ट, विचारशील विद्वान् प्राणी भी इतने स्वार्थ-भक्त होते हैं!

जॉन सेवक अनुमान से उनके मन के भाव ताड़ गए। बोले-आप सोच रहे होंगे, मैंने बातों इतना रंग क्यों भरा, केवल घटना का यथार्थ वृत्तांत क्यों न कह सुनाया; किंतु सोचिए, बिना रंग भरे मुझे यह फल प्राप्त हो सकता? संसार में


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जॉन सेवक विदा हुए। रास्ते में ताहिर अली सोचने लगे-साहब को मेरी दुर्गति से अपना स्वार्थ सिध्द करने में जरा भी संकोच नहीं हुआ। क्या ऐसे धानी-मानी, विशिष्ट, विचारशील विद्वान् प्राणी भी इतने स्वार्थ-भक्त होते हैं!

जॉन सेवक अनुमान से उनके मन के भाव ताड़ गए। बोले-आप सोच रहे होंगे, मैंने बातों इतना रंग क्यों भरा, केवल घटना का यथार्थ वृत्तांत क्यों न कह सुनाया; किंतु सोचिए, बिना रंग भरे मुझे यह फल प्राप्त हो सकता? संसार में


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