ईर्ष्या की आग की भाँति कभी नहीं बुझती। कोई पानी ला रहा था, कोई यों ही शोर मचा रहा था; किंतु अधिकांश लोग चुपचाप खड़े नैराश्यपूर्ण दृष्टि से अग्निदाह को देख रहे थे, मानो किसी मित्र की चिताग्नि है।
सहसा सूरदास दौड़ा हुआ आया और चुपचाप ज्वाला के प्रकाश में खड़ा हो गया।
बजरंगी ने पूछा-यह कैसे लगी सूरे, चूल्हे में तो आग नहीं छोड़ दी थी?
सूरदास-झोंपड़े में जाने का कोई रास्ता ही नहीं है?
बजरंगी-अब तो अंदर-बाहर सब एक हो गया है। दीवारें जल रही हैं।
ईर्ष्या की आग की भाँति कभी नहीं बुझती। कोई पानी ला रहा था, कोई यों ही शोर मचा रहा था; किंतु अधिकांश लोग चुपचाप खड़े नैराश्यपूर्ण दृष्टि से अग्निदाह को देख रहे थे, मानो किसी मित्र की चिताग्नि है।
सहसा सूरदास दौड़ा हुआ आया और चुपचाप ज्वाला के प्रकाश में खड़ा हो गया।
बजरंगी ने पूछा-यह कैसे लगी सूरे, चूल्हे में तो आग नहीं छोड़ दी थी?
सूरदास-झोंपड़े में जाने का कोई रास्ता ही नहीं है?
बजरंगी-अब तो अंदर-बाहर सब एक हो गया है। दीवारें जल रही हैं।