रंगभूमि - Rangbhumi

तो भी अब जमीन नहीं पा सकते।

सूरदास-जमीन की मुझे चिंता नहीं है। मरूँगा, तो सिर पर लाद थोड़े ही ले जाऊँगा। पर अंत में यह सारा पाप मेरे ही सिर पड़ेगा। मैं ही तो इस सारे तूफान की जड़ हूँ, मेरे ही कारन तो यह रगड़-झगड़ मची हुई है, नहीं तो साहब को तुमसे कौन दुसमनी थी।

नायकराम-यारो, सूरे को समझाओ।

जगधार-सूरे, सोचो, हम लोगों की कितनी बेआबरूई हुई है!

सूरदास-आबरू को बनाने-बिगाड़नेवाला आदमी नहीं है, भगवान् है। उन्हीं की निगाह


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तो भी अब जमीन नहीं पा सकते।

सूरदास-जमीन की मुझे चिंता नहीं है। मरूँगा, तो सिर पर लाद थोड़े ही ले जाऊँगा। पर अंत में यह सारा पाप मेरे ही सिर पड़ेगा। मैं ही तो इस सारे तूफान की जड़ हूँ, मेरे ही कारन तो यह रगड़-झगड़ मची हुई है, नहीं तो साहब को तुमसे कौन दुसमनी थी।

नायकराम-यारो, सूरे को समझाओ।

जगधार-सूरे, सोचो, हम लोगों की कितनी बेआबरूई हुई है!

सूरदास-आबरू को बनाने-बिगाड़नेवाला आदमी नहीं है, भगवान् है। उन्हीं की निगाह


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