रंगभूमि - Rangbhumi

जमीन फट जाती और मैं उसमें समा जाती। रानी ने तिरस्कार के भाव से कहा-सोफी, तुम मुझे कृतघ्न समझोगी, मगर मैंने तुम्हें अपने घर में रखकर बड़ी भूल की। ऐसी भूल मैंने कभी न की थी। मैं न जानती थी कि तुम आस्तीन का साँप बनोगी। इससे बहुत अच्छा होता कि विनय उसी दिन आग में जल गया होता। तब मुझे इतना दु:ख न होता। मैं तुम्हारे आचरण को पहले न समझी। मेरी ऑंखों पर परदा पड़ा था। तुम जानती हो, मैंने क्यों विनय को इतनी जल्द यहाँ से भगा दिया? तुम्हारे कारण,


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जमीन फट जाती और मैं उसमें समा जाती। रानी ने तिरस्कार के भाव से कहा-सोफी, तुम मुझे कृतघ्न समझोगी, मगर मैंने तुम्हें अपने घर में रखकर बड़ी भूल की। ऐसी भूल मैंने कभी न की थी। मैं न जानती थी कि तुम आस्तीन का साँप बनोगी। इससे बहुत अच्छा होता कि विनय उसी दिन आग में जल गया होता। तब मुझे इतना दु:ख न होता। मैं तुम्हारे आचरण को पहले न समझी। मेरी ऑंखों पर परदा पड़ा था। तुम जानती हो, मैंने क्यों विनय को इतनी जल्द यहाँ से भगा दिया? तुम्हारे कारण,


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