तो क्यों अपनी जमीन देते हो?
सूरदास-मेरे देने पर थोड़े ही है भाई। मैं दूँ, तो भी जमीन निकल जाएगी, न दूँ, तो निकल जाएगी। रुपयेवाले सब कुछ कर सकते हैं।
बजरंगी-साहब रुपयेवाले होंगे, अपने घर के होंगे। हमारी जमीन क्या खाकर ले लेंगे? माथे गिर जाएँगे, माथे! ठट्ठा नहीं है।
अभी ये ही बातें हो रही थीं कि सैयद ताहिर अली आकर खड़े हो गए, और नायकराम से बोले-पंडाजी, मुझे आपसे कुछ कहना है, जरा इधार चले आइए।
बजरंगी-उसी जमीन के बारे में कुछ बातचीत करनी है न? वह जमीन न बिकेगी।
तो क्यों अपनी जमीन देते हो?
सूरदास-मेरे देने पर थोड़े ही है भाई। मैं दूँ, तो भी जमीन निकल जाएगी, न दूँ, तो निकल जाएगी। रुपयेवाले सब कुछ कर सकते हैं।
बजरंगी-साहब रुपयेवाले होंगे, अपने घर के होंगे। हमारी जमीन क्या खाकर ले लेंगे? माथे गिर जाएँगे, माथे! ठट्ठा नहीं है।
अभी ये ही बातें हो रही थीं कि सैयद ताहिर अली आकर खड़े हो गए, और नायकराम से बोले-पंडाजी, मुझे आपसे कुछ कहना है, जरा इधार चले आइए।
बजरंगी-उसी जमीन के बारे में कुछ बातचीत करनी है न? वह जमीन न बिकेगी।