मिसेज़ सेवक-(रुखाई से) तो क्या आप यह नहीं मानते कि अंगरेजों ने भारत के लिए जो कुछ किया है, वह शायद ही किसी जाति ने किसी जाति या देश के साथ किया हो?
कुँवर साहब-नहीं, मैं यह नहीं मानता।
मिसेज़ सेवक-(आश्चर्य से) शिक्षा का इतना प्रचार और भी किसी काल में हुआ था?
कुँवर साहब-मैं उसे शिक्षा ही नहीं कहता, जो मनुष्य को स्वार्थ का पुतला बना दे।
मिसेज़ सेवक-रेल, तार, जहाज, डाक, ये सब विभूतियाँ अंगरेजों ही के साथ आईं!
कुँवर साहब-अंगरेजों के बगैर भी आ सकती थीं,
मिसेज़ सेवक-(रुखाई से) तो क्या आप यह नहीं मानते कि अंगरेजों ने भारत के लिए जो कुछ किया है, वह शायद ही किसी जाति ने किसी जाति या देश के साथ किया हो?
कुँवर साहब-नहीं, मैं यह नहीं मानता।
मिसेज़ सेवक-(आश्चर्य से) शिक्षा का इतना प्रचार और भी किसी काल में हुआ था?
कुँवर साहब-मैं उसे शिक्षा ही नहीं कहता, जो मनुष्य को स्वार्थ का पुतला बना दे।
मिसेज़ सेवक-रेल, तार, जहाज, डाक, ये सब विभूतियाँ अंगरेजों ही के साथ आईं!
कुँवर साहब-अंगरेजों के बगैर भी आ सकती थीं,