कराऊँ। मेरे सिर पर न जाने क्यों भूत सवार हो जाता है। अनायास ही उलझ पड़ी! भगवान् मुझे कब इतनी बुध्दि होगी कि उनकी इच्छा के सामने सिर झुकाना सीखूँगी?
इंदु ने बाहर की तरफ सिर निकालकर देखा, स्टेशन का सिगनल नजर आ रहा था। नर-नारियों के समूह स्टेशन की ओर दौड़े चले जा रहे थे। सवारियों का ताँता लगा हुआ था। उसने कोचवान से कहा-गाड़ी फेर दो, मैं स्टेशन न जाऊँगी, घर की तरफ चलो।
कोचवान ने कहा-सरकार अब तो आ गए; वह देखिए, कई आदमी मुझे इशारा कर रहे हैं कि घोड़ों को बढ़ाओ,
कराऊँ। मेरे सिर पर न जाने क्यों भूत सवार हो जाता है। अनायास ही उलझ पड़ी! भगवान् मुझे कब इतनी बुध्दि होगी कि उनकी इच्छा के सामने सिर झुकाना सीखूँगी?
इंदु ने बाहर की तरफ सिर निकालकर देखा, स्टेशन का सिगनल नजर आ रहा था। नर-नारियों के समूह स्टेशन की ओर दौड़े चले जा रहे थे। सवारियों का ताँता लगा हुआ था। उसने कोचवान से कहा-गाड़ी फेर दो, मैं स्टेशन न जाऊँगी, घर की तरफ चलो।
कोचवान ने कहा-सरकार अब तो आ गए; वह देखिए, कई आदमी मुझे इशारा कर रहे हैं कि घोड़ों को बढ़ाओ,