सहिष्णुता और मृदु व्यवहार के लिए प्रसिध्द थे; पर निजी व्यवहारों में वह इतने क्षमाशील न थे। इंदु का चेहरा तमतमा उठा, तेज होकर बोली-अगर आपको अपना सम्मान प्यारा है, तो मुझे भी अपना धर्म प्यारा है।
राजा साहब गुस्से के मारे वहाँ से उठकर चले गए और इंदु अकेली रह गई।
साठ-आठ दिनों तक दोनों के मुँह में दही जमा रहा। राजा साहब कभी घर में आ जाते, तो दो-चार बातें करके यों भागते, जैसे पानी में भीग रहे हों। न वह बैठते, न इंदु उन्हें
सहिष्णुता और मृदु व्यवहार के लिए प्रसिध्द थे; पर निजी व्यवहारों में वह इतने क्षमाशील न थे। इंदु का चेहरा तमतमा उठा, तेज होकर बोली-अगर आपको अपना सम्मान प्यारा है, तो मुझे भी अपना धर्म प्यारा है।
राजा साहब गुस्से के मारे वहाँ से उठकर चले गए और इंदु अकेली रह गई।
साठ-आठ दिनों तक दोनों के मुँह में दही जमा रहा। राजा साहब कभी घर में आ जाते, तो दो-चार बातें करके यों भागते, जैसे पानी में भीग रहे हों। न वह बैठते, न इंदु उन्हें