रंगभूमि - Rangbhumi



डाकिया-महाराज, अब आपसे क्या परदा है; सचमुच यही हाल है। हम लोग तो टके के मुलाजिम ठहरे, चार पैसे ऊपर से न कमाएँ तो बाल-बच्चों को कैसे पालें; तलब है, वह साल-साल भर तक नहीं मिलती, लेकिन यहाँ तो जितने ही ऊँचे ओहदे पर है, उसका पेट भी उतना ही बड़ा है।

दस बजते-बजते दोंनों आदमी जसवंतनगर पहुँच गए। विनय बस्ती के बाहर ही एक वृक्ष के नीचे बैठ गए और डाकिए से जाने को कहा। डाकिए ने उनसे अपने घर चलने का बहुत आग्रह किया। जब वह किसी तरह न राजी हुए,


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डाकिया-महाराज, अब आपसे क्या परदा है; सचमुच यही हाल है। हम लोग तो टके के मुलाजिम ठहरे, चार पैसे ऊपर से न कमाएँ तो बाल-बच्चों को कैसे पालें; तलब है, वह साल-साल भर तक नहीं मिलती, लेकिन यहाँ तो जितने ही ऊँचे ओहदे पर है, उसका पेट भी उतना ही बड़ा है।

दस बजते-बजते दोंनों आदमी जसवंतनगर पहुँच गए। विनय बस्ती के बाहर ही एक वृक्ष के नीचे बैठ गए और डाकिए से जाने को कहा। डाकिए ने उनसे अपने घर चलने का बहुत आग्रह किया। जब वह किसी तरह न राजी हुए,


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