एक ग्रंथालय बनाया। हर रविवार को सभी राजबंदी बारी-बारी से जाकर पुस्तकें बदल लेते थे। इस तरह क्रम शुरू हुआ।
ग्रंथालय के प्रबंध से एक-एक को पढ़ने के लिए विविध पुस्तकें मिलने लगी और जिन राजबंदियों को घर से पुस्तकें भेजने योग्य भी कोई आधार नहीं था, उन्हें सरेआम मंगवाने के समय इस तरह तय किए कि हर किसी को प्रतिवर्ष एक ही पार्सल मिलता, तथापि अलग-अलग समय पर मंगवाने से हर महीने किसी-न-किसी का
पार्सल आता ही रहता। उसमें भी एक जो पुस्तकें मंगवाता,
एक ग्रंथालय बनाया। हर रविवार को सभी राजबंदी बारी-बारी से जाकर पुस्तकें बदल लेते थे। इस तरह क्रम शुरू हुआ।
ग्रंथालय के प्रबंध से एक-एक को पढ़ने के लिए विविध पुस्तकें मिलने लगी और जिन राजबंदियों को घर से पुस्तकें भेजने योग्य भी कोई आधार नहीं था, उन्हें सरेआम मंगवाने के समय इस तरह तय किए कि हर किसी को प्रतिवर्ष एक ही पार्सल मिलता, तथापि अलग-अलग समय पर मंगवाने से हर महीने किसी-न-किसी का
पार्सल आता ही रहता। उसमें भी एक जो पुस्तकें मंगवाता,