उस पर्यवेक्षक के बदलते ही बारी पुनः-पुनः हस्तक्षेप करता। कभी पत्रिका के पन्ने फाड़ लेता और कभी-कभी उनमें से आक्षेपयोग्य पन्नों को काली स्याही से मटियामेट करके देता। जो मिल गया उसको स्वीकार करके बहस जारी रखने का उपक्रम हमने कर ही रखा था। एक-दो बार तो वर्ष भर बाद हमारे पार्सल आने पर भी बारी ने हमसे कह दिया, नहीं आए। खोज लेने पर सिद्व हुआ कि उनको आए महीना हो गया। तब बारी पर्यवेक्षक के सामने नाक रगड़ते-रगड़ते थक गया। एक-दो बार
उस पर्यवेक्षक के बदलते ही बारी पुनः-पुनः हस्तक्षेप करता। कभी पत्रिका के पन्ने फाड़ लेता और कभी-कभी उनमें से आक्षेपयोग्य पन्नों को काली स्याही से मटियामेट करके देता। जो मिल गया उसको स्वीकार करके बहस जारी रखने का उपक्रम हमने कर ही रखा था। एक-दो बार तो वर्ष भर बाद हमारे पार्सल आने पर भी बारी ने हमसे कह दिया, नहीं आए। खोज लेने पर सिद्व हुआ कि उनको आए महीना हो गया। तब बारी पर्यवेक्षक के सामने नाक रगड़ते-रगड़ते थक गया। एक-दो बार