शिक्षित और स्वतंत्र विवेकी वर्ग को देने में कोई आपत्तिा न उठाई जाए, क्योंकि हिंदुस्थान सरकार के साहित्य प्रबंधक विभाग (सेंसर आॅफिस) की हजार आंखों से भी जो पुस्तक छूट गई वह राजद्रोही अथवा अपठनीय नहीं हो सकती। बारी जैसे अनभिज्ञ मनुष्य द्वारा उसे भी आपत्तिाजनक समझने का अर्थ है- उन विज्ञ साहित्य प्रंबधक के सहÛ चक्षुओं को भी दृष्टिहीन साबित करना। हमने यह सब कमिश्नर के सामने स्पष्ट किया। तब कहीं ये पत्रिकाएं मिलने लगी। तथापि
शिक्षित और स्वतंत्र विवेकी वर्ग को देने में कोई आपत्तिा न उठाई जाए, क्योंकि हिंदुस्थान सरकार के साहित्य प्रबंधक विभाग (सेंसर आॅफिस) की हजार आंखों से भी जो पुस्तक छूट गई वह राजद्रोही अथवा अपठनीय नहीं हो सकती। बारी जैसे अनभिज्ञ मनुष्य द्वारा उसे भी आपत्तिाजनक समझने का अर्थ है- उन विज्ञ साहित्य प्रंबधक के सहÛ चक्षुओं को भी दृष्टिहीन साबित करना। हमने यह सब कमिश्नर के सामने स्पष्ट किया। तब कहीं ये पत्रिकाएं मिलने लगी। तथापि