हो। वही प्रयास ‘गोमंतक’ के वैनायक वृत्त’¹ में परिणत हो गया है।
राजबंदियों में केवल हम दो-तीन महाराष्ट्रीयनों को ही मराठी पुस्तकें मंगवाने की आवश्यकता प्रतीत होती थी। परंतु प्राचीन पुस्तकंे प्रायः परिचित होने के कारण मात्र ‘चित्रमय जगत्’ आदि कुछ नई पत्रिकाएं तथा नई प्रकाशित पुस्तकें की हम अपने लिए मंगवाते। परंतु साधारण बंदियों में, उनके लिए जो मराठी बंदिवान थे और हमारे कष्टभागी श्री वामनराव जोशी और उन राजबंदियांे के लिए,
हो। वही प्रयास ‘गोमंतक’ के वैनायक वृत्त’¹ में परिणत हो गया है।
राजबंदियों में केवल हम दो-तीन महाराष्ट्रीयनों को ही मराठी पुस्तकें मंगवाने की आवश्यकता प्रतीत होती थी। परंतु प्राचीन पुस्तकंे प्रायः परिचित होने के कारण मात्र ‘चित्रमय जगत्’ आदि कुछ नई पत्रिकाएं तथा नई प्रकाशित पुस्तकें की हम अपने लिए मंगवाते। परंतु साधारण बंदियों में, उनके लिए जो मराठी बंदिवान थे और हमारे कष्टभागी श्री वामनराव जोशी और उन राजबंदियांे के लिए,