अनुचित कैसे है। किसी भी तरह वह क्रांतियुद्व सिपाहियों का तो था ही नहीं। आगे चलकर हर कोई तात्या तोपे, नाना साहब, पेशवा, कुंवर सिंह, लक्ष्मीबाई आदि नामों को जानने लगा। थाॅमस एकंेपिस लिखित ‘इमिटेशंस’ हमारी प्रिय पुस्तक थी। ‘कुरान’ का अंगे्रजी अनुवाद पहले पढ़ा, इसके पश्चात् बंगला में सरसरी दृष्टि से देखा। हिंदुस्थान के तट पर पहंुचने पर उसके मराठी अनुवाद के पन्ने पलटे। इसके अतिरिक्त अपने मुसलमान मित्र के
अभिप्राय के अनुरूप कि उसे मूल में पढ़ने से उसका सही स्वाद मिलेगा,
अनुचित कैसे है। किसी भी तरह वह क्रांतियुद्व सिपाहियों का तो था ही नहीं। आगे चलकर हर कोई तात्या तोपे, नाना साहब, पेशवा, कुंवर सिंह, लक्ष्मीबाई आदि नामों को जानने लगा। थाॅमस एकंेपिस लिखित ‘इमिटेशंस’ हमारी प्रिय पुस्तक थी। ‘कुरान’ का अंगे्रजी अनुवाद पहले पढ़ा, इसके पश्चात् बंगला में सरसरी दृष्टि से देखा। हिंदुस्थान के तट पर पहंुचने पर उसके मराठी अनुवाद के पन्ने पलटे। इसके अतिरिक्त अपने मुसलमान मित्र के
अभिप्राय के अनुरूप कि उसे मूल में पढ़ने से उसका सही स्वाद मिलेगा,