पढ़ने को उठाया और उसमें इतना रस उत्पन्न हुआ और ऐसा लगा कि वेदांत पर हमारे अवलोकन में आए हुए गं्रथों में इतना सुंदर गं्रथ विरला ही है। इतने निरपवाद सिद्वांत और इतनी सुंदर कविता कि जिसके मुख से मधुर स्वरांे में उन सिद्वातों का श्रवण किया जाता है और उससे मन तल्लीन होकर आत्मा भी उनका श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त करती है। संस्कृत कवि ही दर्शन और काव्य का इतना मनोहर गठबंधन कर सकते हैं। देखिए ‘भगवद्गीता’ का विश्वरूप दर्शन और
पढ़ने को उठाया और उसमें इतना रस उत्पन्न हुआ और ऐसा लगा कि वेदांत पर हमारे अवलोकन में आए हुए गं्रथों में इतना सुंदर गं्रथ विरला ही है। इतने निरपवाद सिद्वांत और इतनी सुंदर कविता कि जिसके मुख से मधुर स्वरांे में उन सिद्वातों का श्रवण किया जाता है और उससे मन तल्लीन होकर आत्मा भी उनका श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त करती है। संस्कृत कवि ही दर्शन और काव्य का इतना मनोहर गठबंधन कर सकते हैं। देखिए ‘भगवद्गीता’ का विश्वरूप दर्शन और