काव्य अध्याय अथवा कालिदास के काव्यांतर्गत विष्णु वर्णन का श्लोक अथवा ‘कुमारसंभव’ के अंतर्गत ये सरस वचन- ‘स्वयंविधाता तपसः फलानाम् केनापि कायेन तपश्चचार, ’ जो गगन सदृश अनाकलनीय व्यापक अर्थ को किसी सुंदर सरोवर सदृश श्लोक में प्रतिबिंबित करते हैं।
वास्तव में कविता और दर्शन में विरोध होना असंभव ही है। कविता सुंदरता पर मोहित होती है, सुंदरता वही जो निरपवाद परिपूर्ण है और आनंद, उल्लास प्रदान करती है। सत्य वही जो इंद्रिय,
काव्य अध्याय अथवा कालिदास के काव्यांतर्गत विष्णु वर्णन का श्लोक अथवा ‘कुमारसंभव’ के अंतर्गत ये सरस वचन- ‘स्वयंविधाता तपसः फलानाम् केनापि कायेन तपश्चचार, ’ जो गगन सदृश अनाकलनीय व्यापक अर्थ को किसी सुंदर सरोवर सदृश श्लोक में प्रतिबिंबित करते हैं।
वास्तव में कविता और दर्शन में विरोध होना असंभव ही है। कविता सुंदरता पर मोहित होती है, सुंदरता वही जो निरपवाद परिपूर्ण है और आनंद, उल्लास प्रदान करती है। सत्य वही जो इंद्रिय,