मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas

मन-बुद्वि के विरोध के लिए रत्ती भर भी अवकाश न देते हुए शंकाकुल आत्मा को निस्संदेह तथा संपूर्ण संतोष में डालने के लिए बाध्य करता है। वही समाधान-समाधि का सौंदर्य और इसीलिए कविता वहीं पर ‘कंठे स्वयंग्राहनिर्षिकत्बाहुः होकर अपने कार्य की परम तुष्टि प्राप्त करती है।

वेदांत विषयक ये गं्रथ पढ़ते समय एक अनुभूति हमें बार-बार अवश्य होती थी कि शरीर की नस-नस समरस, तल्लीन किंतु ढीली पुनः कर्म के पचड़े में पड़ने से साफ मना कर देती।


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मन-बुद्वि के विरोध के लिए रत्ती भर भी अवकाश न देते हुए शंकाकुल आत्मा को निस्संदेह तथा संपूर्ण संतोष में डालने के लिए बाध्य करता है। वही समाधान-समाधि का सौंदर्य और इसीलिए कविता वहीं पर ‘कंठे स्वयंग्राहनिर्षिकत्बाहुः होकर अपने कार्य की परम तुष्टि प्राप्त करती है।

वेदांत विषयक ये गं्रथ पढ़ते समय एक अनुभूति हमें बार-बार अवश्य होती थी कि शरीर की नस-नस समरस, तल्लीन किंतु ढीली पुनः कर्म के पचड़े में पड़ने से साफ मना कर देती।


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