कर्मोत्साह पूरी तरह से समाप्तप्राय होता। ‘नैष्कम्र्य सिद्विं परमा’ ये शब्द सतत गुनगुनाए जाते। स्वदेश सेवा, परोपकार, भूत दया आदि अत्युदार भाषा भी क्षणिक और लड़कखेल प्रतीत होती। यही अवस्था भूगर्भशास्त्र अथवा ज्योतिषशास्त्रीय पुस्तकें पढ़ते समय, परंतु भिन्न कारणवश होती। इन शास्त्रांतर्गत काल तथा प्रकृति की कष्टप्रद भव्यता देखकर पृथ्वी और व्यक्ति का जीवन तुच्छ सा होकर निराशापूर्ण कर्मव्यर्थता होता और दुःख भी होता, परंतु वेदांत
कर्मोत्साह पूरी तरह से समाप्तप्राय होता। ‘नैष्कम्र्य सिद्विं परमा’ ये शब्द सतत गुनगुनाए जाते। स्वदेश सेवा, परोपकार, भूत दया आदि अत्युदार भाषा भी क्षणिक और लड़कखेल प्रतीत होती। यही अवस्था भूगर्भशास्त्र अथवा ज्योतिषशास्त्रीय पुस्तकें पढ़ते समय, परंतु भिन्न कारणवश होती। इन शास्त्रांतर्गत काल तथा प्रकृति की कष्टप्रद भव्यता देखकर पृथ्वी और व्यक्ति का जीवन तुच्छ सा होकर निराशापूर्ण कर्मव्यर्थता होता और दुःख भी होता, परंतु वेदांत