इसका विवरण थोड़ा-बहुत पहले आया ही है। जैसे-जैसे यह सारा तमाशा हमारी दृष्टि में आने लगा, वैसे-वैसे हम सोचने लगे कि इसका कुछ-न-कुछ प्रतिकार करना ही होगा। हर महीने-पखवाड़े कम-से-कम एकाध हिंदू गुपचुप हिंदुओं की पंक्ति से उठकर मुसलमानों की पंक्ति में भोजन करता हुआ दिखाई देता। यह स्थिति हमें दुस्सह प्रतीत होती। परंतु हम ठहरे कोठरीबंद। हमें समझ नहीं आ रहा था कि किया क्या जाए? अन्य हिंदू बंदियों के मन में थोड़ा आवेश उत्पन्न का प्रयास
इसका विवरण थोड़ा-बहुत पहले आया ही है। जैसे-जैसे यह सारा तमाशा हमारी दृष्टि में आने लगा, वैसे-वैसे हम सोचने लगे कि इसका कुछ-न-कुछ प्रतिकार करना ही होगा। हर महीने-पखवाड़े कम-से-कम एकाध हिंदू गुपचुप हिंदुओं की पंक्ति से उठकर मुसलमानों की पंक्ति में भोजन करता हुआ दिखाई देता। यह स्थिति हमें दुस्सह प्रतीत होती। परंतु हम ठहरे कोठरीबंद। हमें समझ नहीं आ रहा था कि किया क्या जाए? अन्य हिंदू बंदियों के मन में थोड़ा आवेश उत्पन्न का प्रयास