प्रातः काल उठते ही लंगोट कसकर कमरे में बंद होना पड़ता। भीतर कोल्हू की डांडी को ऐसे घुमाना पड़ता जैसे हाथ से पहिया घुमाया जाता है। उस ओखली में गोले पड़ते ही वह इतनी भारी हो जाती कि अतिरथी, महारथी कुली भी उसके बीस फेरे पूरे करते-करते लुढ़क जाता। चोर-डाकुओं को भी
बीस से कम उम्र में सहसा इस काम में नहीं जोता जाता। परंतु अंदमानी वैद्यकशास्त्र के अनुसार राजबंदी यह डांडी किसी भी उम्र में घुमा सकते थे। अतः उस डांडी को आधा घेरा
प्रातः काल उठते ही लंगोट कसकर कमरे में बंद होना पड़ता। भीतर कोल्हू की डांडी को ऐसे घुमाना पड़ता जैसे हाथ से पहिया घुमाया जाता है। उस ओखली में गोले पड़ते ही वह इतनी भारी हो जाती कि अतिरथी, महारथी कुली भी उसके बीस फेरे पूरे करते-करते लुढ़क जाता। चोर-डाकुओं को भी
बीस से कम उम्र में सहसा इस काम में नहीं जोता जाता। परंतु अंदमानी वैद्यकशास्त्र के अनुसार राजबंदी यह डांडी किसी भी उम्र में घुमा सकते थे। अतः उस डांडी को आधा घेरा