शरीर इतना थक जाता कि रात में तख्ते पर लेटते ही नींद आने के बदले करवट बदलते हुए रात काटनी पड़ती थी। दूसरे दिन प्रातःकाल पुनः कोल्हू के सामने जा पहंुचता। इस तरह छह-सात दिन गुजारे। तब तक काम पूरा कहां होता था? एक दिन बारी आया और इठलाते हुए कहने लगा,‘‘यह देखिए, आपके पासवाली कोठरी का बंदी दो बजे पूरा तीस पौंड तेल तौलकर देता है और आप शाम तक कोल्हू चलाकर भी पौंड-दो पौंड ही निकालते हैं, इस पर आपको शर्म आनी चाहिए।’’ मैं बोला, ‘‘शर्म
शरीर इतना थक जाता कि रात में तख्ते पर लेटते ही नींद आने के बदले करवट बदलते हुए रात काटनी पड़ती थी। दूसरे दिन प्रातःकाल पुनः कोल्हू के सामने जा पहंुचता। इस तरह छह-सात दिन गुजारे। तब तक काम पूरा कहां होता था? एक दिन बारी आया और इठलाते हुए कहने लगा,‘‘यह देखिए, आपके पासवाली कोठरी का बंदी दो बजे पूरा तीस पौंड तेल तौलकर देता है और आप शाम तक कोल्हू चलाकर भी पौंड-दो पौंड ही निकालते हैं, इस पर आपको शर्म आनी चाहिए।’’ मैं बोला, ‘‘शर्म