तुम्हारी कर्तृव्य-शक्ति के मेरूदंड का निर्माण इसलिए हुआ था कि उसका समुद्रमंथनार्थ उपयोग हो, उसे इस यःकश्चित् बटलोई के चुल्लू भर छाछ मथने के काम में जुटाकर उसका अनादर क्यों कर रहे हो? चित्त पुनः-पुनः कहता, ‘अब जीना व्यर्थ, अब आत्मघात ही आत्मसम्मान सिद्व होगा।’ नोवालिस आदि कई नीति विशारदों का और ऐतिहासिक उदाहरणों का स्मरण होने लगा, जिन्होंने प्रसंगवश आत्मघात को आत्मकर्तव्य सिद्व किया था।
एक दिन दोपहर की चिलचिलाती धूप में कोल्हू चलाते समय मैं हांफने लगा; ऐसा लगा,
तुम्हारी कर्तृव्य-शक्ति के मेरूदंड का निर्माण इसलिए हुआ था कि उसका समुद्रमंथनार्थ उपयोग हो, उसे इस यःकश्चित् बटलोई के चुल्लू भर छाछ मथने के काम में जुटाकर उसका अनादर क्यों कर रहे हो? चित्त पुनः-पुनः कहता, ‘अब जीना व्यर्थ, अब आत्मघात ही आत्मसम्मान सिद्व होगा।’ नोवालिस आदि कई नीति विशारदों का और ऐतिहासिक उदाहरणों का स्मरण होने लगा, जिन्होंने प्रसंगवश आत्मघात को आत्मकर्तव्य सिद्व किया था।
एक दिन दोपहर की चिलचिलाती धूप में कोल्हू चलाते समय मैं हांफने लगा; ऐसा लगा,