चक्कर आ रहा है। मैं धम्म से नीचे बैठ गया। अत्यधिक श्रम के कारण अॅंतड़ियां ऐंठने लगी। पेट पकड़कर दीवार से सिर टिकाया, आंखें मूंद ली और तभी उसी जगह गहरी नींद आ गई। इतनी गहरी कि जब चैंककर आंख खुली तब दिशाविदिशा, स्थल-काल किसी का भी चार-पांच मिनट तक भान नहीं हो रहा था। इस तरह शांत, शून्य, निर्विकार, सुखद अवस्था में ऐसे पड़ा रह गया जैसे मेरा अस्तित्व ही नहीं रहा। थोड़ी देर बाद मेरी चेतना लौट आई। एक-एक वस्तु दिखाई देने लगी। उसके
चक्कर आ रहा है। मैं धम्म से नीचे बैठ गया। अत्यधिक श्रम के कारण अॅंतड़ियां ऐंठने लगी। पेट पकड़कर दीवार से सिर टिकाया, आंखें मूंद ली और तभी उसी जगह गहरी नींद आ गई। इतनी गहरी कि जब चैंककर आंख खुली तब दिशाविदिशा, स्थल-काल किसी का भी चार-पांच मिनट तक भान नहीं हो रहा था। इस तरह शांत, शून्य, निर्विकार, सुखद अवस्था में ऐसे पड़ा रह गया जैसे मेरा अस्तित्व ही नहीं रहा। थोड़ी देर बाद मेरी चेतना लौट आई। एक-एक वस्तु दिखाई देने लगी। उसके