की कृपा से वे राजबंदी मेरे पास आते। यथासंभव मुझसे बतियाते। प्रायः सायंकाल पांच बजे के आस-पास भोजन की धांधली में जब सभी व्यस्त होते तब उस क्रमांक के हौज की ओट में हमारा अड्डा जमता। एक पहरा देता, शेष जन बातें करते । उस समय जिस कार्य के अनवरत चिंतनवश चित्त ने सभी ऐहिक सुखों को लात मारी थी, उस उदात्त कार्य की थोड़ी देर खुलकर चर्चा करना संभव होने से मन पुनः वह सम्मान और उत्साह प्रतीत होता। भोगी हुई यातनाएं अकिंचन लगती। पुनः
की कृपा से वे राजबंदी मेरे पास आते। यथासंभव मुझसे बतियाते। प्रायः सायंकाल पांच बजे के आस-पास भोजन की धांधली में जब सभी व्यस्त होते तब उस क्रमांक के हौज की ओट में हमारा अड्डा जमता। एक पहरा देता, शेष जन बातें करते । उस समय जिस कार्य के अनवरत चिंतनवश चित्त ने सभी ऐहिक सुखों को लात मारी थी, उस उदात्त कार्य की थोड़ी देर खुलकर चर्चा करना संभव होने से मन पुनः वह सम्मान और उत्साह प्रतीत होता। भोगी हुई यातनाएं अकिंचन लगती। पुनः