के थियोसोफिकल दर्शन की। एक वाॅर्डर उन्हें एक कंबल में सब्जी की तरह भरकर हर कक्ष में घूमता और राजबंदियों में बांटता और फिर शाम होते ही वापस ले जाता। वास्तव में पढ़ने को एक पुस्तक मिलती, परंतु जिसकी वह हो उसे ही, ओर वह भी केवल संध्या समय चार से छह बजे तक। दिन में काम पहाड़ खड़ा करके पढ़ने नहीं दिया जाता और रात में कोठरी में घुप अंधेरा होता, इसलिए पढ़ा नहीं जा सकता था। उस पर भी एक और कष्टप्रद नियम यह कि एक राजबंदी की पुस्तक, उसकी इच्छा होने पर भी,
के थियोसोफिकल दर्शन की। एक वाॅर्डर उन्हें एक कंबल में सब्जी की तरह भरकर हर कक्ष में घूमता और राजबंदियों में बांटता और फिर शाम होते ही वापस ले जाता। वास्तव में पढ़ने को एक पुस्तक मिलती, परंतु जिसकी वह हो उसे ही, ओर वह भी केवल संध्या समय चार से छह बजे तक। दिन में काम पहाड़ खड़ा करके पढ़ने नहीं दिया जाता और रात में कोठरी में घुप अंधेरा होता, इसलिए पढ़ा नहीं जा सकता था। उस पर भी एक और कष्टप्रद नियम यह कि एक राजबंदी की पुस्तक, उसकी इच्छा होने पर भी,