फिर अन्य लोगों को कौन पूछता है? हिंदुस्थान से नियमित रूप से समालोचक के रूप में किसी के भी आने का भय नहीं था। कभी कहीं किसी दंगा-फसाद की बात फेल जाने से ही ऊपर से कोई आता। इस तरह बात फेल गई तो उसे ऊपर तक पहुंचाने से रोकने का पूरा-पूरा प्रयास होना स्वाभाविक ही था। ऐसी अवस्था
में उस अधिकारी-पंचायत से बाहर अंदमान का समाचार फूटना कठिन हो जाता था। ये अधिकारी अपनी-अपनी न्यायबुद्वि से आवेदन-पत्र की शिकायतों और प्रतिवादों का
फिर अन्य लोगों को कौन पूछता है? हिंदुस्थान से नियमित रूप से समालोचक के रूप में किसी के भी आने का भय नहीं था। कभी कहीं किसी दंगा-फसाद की बात फेल जाने से ही ऊपर से कोई आता। इस तरह बात फेल गई तो उसे ऊपर तक पहुंचाने से रोकने का पूरा-पूरा प्रयास होना स्वाभाविक ही था। ऐसी अवस्था
में उस अधिकारी-पंचायत से बाहर अंदमान का समाचार फूटना कठिन हो जाता था। ये अधिकारी अपनी-अपनी न्यायबुद्वि से आवेदन-पत्र की शिकायतों और प्रतिवादों का