कर ही रहे थे। उसे बंद करने का प्रयास करना है तो प्रथमतः उसे सार्वजनिक रूप में उजागर करना होगा। यह उपाय करते हुए कष्ट भी हो तो उसे कुल अंतिम लाभ के मूल्य स्वरूप सहना होगा।
परंतु यह प्रश्न मात्र तत्कालीन राजबंदियों का ही नहीं था अपितु समस्त राजबंदी वर्ग का ही था। क्यांेकि यह संभावना प्रकट रूप में ही दीख रही थी कि उस पहले दल के बाद हिंदुस्थान की तत्कालीन परिस्थिति में, हिंदुस्थानी राजनीति में राजबंदी जैसी संस्था एक साधारण बात बनेगी और वह भी दस-बीस की नहीं,
कर ही रहे थे। उसे बंद करने का प्रयास करना है तो प्रथमतः उसे सार्वजनिक रूप में उजागर करना होगा। यह उपाय करते हुए कष्ट भी हो तो उसे कुल अंतिम लाभ के मूल्य स्वरूप सहना होगा।
परंतु यह प्रश्न मात्र तत्कालीन राजबंदियों का ही नहीं था अपितु समस्त राजबंदी वर्ग का ही था। क्यांेकि यह संभावना प्रकट रूप में ही दीख रही थी कि उस पहले दल के बाद हिंदुस्थान की तत्कालीन परिस्थिति में, हिंदुस्थानी राजनीति में राजबंदी जैसी संस्था एक साधारण बात बनेगी और वह भी दस-बीस की नहीं,