भारतीय सज्जनों के पास उन छोटे-बड़े अधिकारियांे को भेजना था, जो कारागृह के कामकाज निपटाकर बाहर जाते थे। बाहर के सहानुभूति रखनेवाले उन लोगों में समाचार-पत्र पढ़नेवाले अनपढ़ मित्रों में प्रायः इतनी बौद्विक शक्ति नहीं होती थी कि वार्त्ता मौखिक रूप में भीतर ला सकें। समाचार लिखकर देने और ले आने का साहस करनेवाला हजारों में इक्का-दुक्का ही होता था। पर किसी ने वैसा किया, यह ज्ञात होते ही उन बाहरवालों को ऐसे अत्याचारों का सामना करना
भारतीय सज्जनों के पास उन छोटे-बड़े अधिकारियांे को भेजना था, जो कारागृह के कामकाज निपटाकर बाहर जाते थे। बाहर के सहानुभूति रखनेवाले उन लोगों में समाचार-पत्र पढ़नेवाले अनपढ़ मित्रों में प्रायः इतनी बौद्विक शक्ति नहीं होती थी कि वार्त्ता मौखिक रूप में भीतर ला सकें। समाचार लिखकर देने और ले आने का साहस करनेवाला हजारों में इक्का-दुक्का ही होता था। पर किसी ने वैसा किया, यह ज्ञात होते ही उन बाहरवालों को ऐसे अत्याचारों का सामना करना