थे। इस तथ्य को हम भी स्वीकार करते हैं कि अपराधियों को राजा-महाराजाओं के समान ठाठ-बाट के साथ पंचकपवानों का आस्वाद लेने के लिए बंद नहीं किया गया है, अपितु बंदीगृह में उनका जीवन इतना नीरस किया जाए कि उनमें यह अहसास जाग उठे कि उन्हें अपनी स्वार्थंध सुख लालसावश किए गए सामाजिक अपराधार्थ ऐहिक सुखों से वंचित होना पड़ रहा है। इसीलिए बंदीगृह में भोजन के स्वादिष्ट न होने का स्पष्ट असहसास होता था। वह एक तरह से ठीक ही था। उस पर जैसे
थे। इस तथ्य को हम भी स्वीकार करते हैं कि अपराधियों को राजा-महाराजाओं के समान ठाठ-बाट के साथ पंचकपवानों का आस्वाद लेने के लिए बंद नहीं किया गया है, अपितु बंदीगृह में उनका जीवन इतना नीरस किया जाए कि उनमें यह अहसास जाग उठे कि उन्हें अपनी स्वार्थंध सुख लालसावश किए गए सामाजिक अपराधार्थ ऐहिक सुखों से वंचित होना पड़ रहा है। इसीलिए बंदीगृह में भोजन के स्वादिष्ट न होने का स्पष्ट असहसास होता था। वह एक तरह से ठीक ही था। उस पर जैसे