धूप में सैकड़ों बंदियों का भोजन तैयार करके उन्हें परोसते-परोसते उन चार-पांच रसोइयों के टांके ढीले हो जाते। वे इसीलिए यह काम करते कि रसोईघर में काम करते-करते एकाध सब्जी या साग चोरी-चोरी खाने के लिए मिल जाती, तिसपर जिन्हें फिर भी ये काम एकाध सब्जी या साग चोरी-चोरी खाने के लिए मिल जाती, तिसपर जिन्हें फिर भी ये काम असहनीय प्रतीत होते, उन्हें करने से इन्कार करें तो सुने कौन? ऐसी स्थिति में ‘स्वादिष्ट’ भोजन शब्द ही हम भूल गए
धूप में सैकड़ों बंदियों का भोजन तैयार करके उन्हें परोसते-परोसते उन चार-पांच रसोइयों के टांके ढीले हो जाते। वे इसीलिए यह काम करते कि रसोईघर में काम करते-करते एकाध सब्जी या साग चोरी-चोरी खाने के लिए मिल जाती, तिसपर जिन्हें फिर भी ये काम एकाध सब्जी या साग चोरी-चोरी खाने के लिए मिल जाती, तिसपर जिन्हें फिर भी ये काम असहनीय प्रतीत होते, उन्हें करने से इन्कार करें तो सुने कौन? ऐसी स्थिति में ‘स्वादिष्ट’ भोजन शब्द ही हम भूल गए