जब तक पेट में नहीं जाता तब तक जिस तरह बंदियों के साथ व्यवहार किया जाता, उस पद्वति से होता। क्योंकि भोजन के समय बंदियों की पंक्तियां कड़ी धूप में और वर्षा में भी बैठाई जाती थी, कोई भी पंक्ति के बाहर नहीं बैठ सकता था। इस अत्याचार के विरोधार्थ राजबंदियों में से कुछ लोग थाली में भोजन पड़ते ही उठकर छांव में जा बैठते। पेटी अफसर गाली-गलौज करता। बारी पंगत छोड़ने का आरोप लगाकर अभियोग चलाता। बंदियों को बहकाने-फुसलाने के आरोप में पर्यवेक्षक
जब तक पेट में नहीं जाता तब तक जिस तरह बंदियों के साथ व्यवहार किया जाता, उस पद्वति से होता। क्योंकि भोजन के समय बंदियों की पंक्तियां कड़ी धूप में और वर्षा में भी बैठाई जाती थी, कोई भी पंक्ति के बाहर नहीं बैठ सकता था। इस अत्याचार के विरोधार्थ राजबंदियों में से कुछ लोग थाली में भोजन पड़ते ही उठकर छांव में जा बैठते। पेटी अफसर गाली-गलौज करता। बारी पंगत छोड़ने का आरोप लगाकर अभियोग चलाता। बंदियों को बहकाने-फुसलाने के आरोप में पर्यवेक्षक