सर्दी से सारा शरीर ठिठुर रहा होता, ऐसी अवस्था में एक हाथ में वर्षा में भीगी तर-बतर रोटियां और चावल थामे वर्षा के पानी से लबालब भरे कटोरे से दाल सुड़कते हुए खड़े-खड़े बंदियों को यह भोजन गले के नीचे
उतारना पड़ता। इस तरह का प्रसंग एक-दो बार नहीं आता, यह लगभग प्रथा ही बन चुकी थी। केवल वही इससे मुक्त थे जिन्हें बाहर जाने के बाद स्वतंत्र रूप से भोजन बनाने का अधिकार प्राप्त हो गया था। परंतु राजबंदी भले ही कहीं जाएं, उन्हें या तो इन कष्टों का सामना करना पड़ता,
सर्दी से सारा शरीर ठिठुर रहा होता, ऐसी अवस्था में एक हाथ में वर्षा में भीगी तर-बतर रोटियां और चावल थामे वर्षा के पानी से लबालब भरे कटोरे से दाल सुड़कते हुए खड़े-खड़े बंदियों को यह भोजन गले के नीचे
उतारना पड़ता। इस तरह का प्रसंग एक-दो बार नहीं आता, यह लगभग प्रथा ही बन चुकी थी। केवल वही इससे मुक्त थे जिन्हें बाहर जाने के बाद स्वतंत्र रूप से भोजन बनाने का अधिकार प्राप्त हो गया था। परंतु राजबंदी भले ही कहीं जाएं, उन्हें या तो इन कष्टों का सामना करना पड़ता,