बात कर सकताा था। दिन भर उस कोठरी के सामने बरामदे में बैठकर रस्सी बटने का काम करते रहते और संध्या होते ही पुनः उसी कोठरी में बंद किया जाता, जिसमें सुबह तक अकेले पड़े रहना पड़ता। इस तरह बरस बीतते रहे। केवल भोजन के लिए दो घंटे बाहर आते। बस उसी समय लोगों में घुलने-मिलने का अवसर मिलता।
इस समय मेरा व्यवहार थाने में निश्चित किए गए कार्यक्रम के अनुसार चल रहा था। यथासंभव सार्वजनिक हितार्थ प्रयत्नरत रहते हुए भी कारागृह के नियमों
बात कर सकताा था। दिन भर उस कोठरी के सामने बरामदे में बैठकर रस्सी बटने का काम करते रहते और संध्या होते ही पुनः उसी कोठरी में बंद किया जाता, जिसमें सुबह तक अकेले पड़े रहना पड़ता। इस तरह बरस बीतते रहे। केवल भोजन के लिए दो घंटे बाहर आते। बस उसी समय लोगों में घुलने-मिलने का अवसर मिलता।
इस समय मेरा व्यवहार थाने में निश्चित किए गए कार्यक्रम के अनुसार चल रहा था। यथासंभव सार्वजनिक हितार्थ प्रयत्नरत रहते हुए भी कारागृह के नियमों